महेश भादाणी. सच्ची बात बीकानेर। पंचायतराज चुनाव की लॉटरी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही बीकानेर की ग्रामीण राजनीति में सियासी हलचल तेज होने लगी है। जिला परिषद प्रमुख की सीट के आरक्षण के बाद अब 17 अगस्त को जिला परिषद सदस्यों के वार्डों की लॉटरी होगी। इसके साथ ही चुनावी तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगेगी और राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुट जाएंगे।
बीकानेर जिला परिषद लंबे समय से कांग्रेस की मजबूत राजनीतिक जमीन रही है। ऐसे में इस बार कांग्रेस के सामने जहां अपने गढ़ को बचाने की चुनौती होगी, वहीं भाजपा इस परंपरागत समीकरण को बदलने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। चुनाव में दोनों दलों के स्थानीय नेताओं की भूमिका अहम रहेगी, लेकिन कांग्रेस के लिए यह चुनाव संगठन की कमान संभाल रहे जिला अध्यक्ष बिशनाराम सियाग के लिए भी किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं होगा।
बिशनाराम के लिए संगठनात्मक परीक्षा
बीकानेर जिले की पांच विधानसभा सीटों पर स्थानीय नेताओं की अपने-अपने क्षेत्रों में सीधी भूमिका रहती है। चुनाव में प्रत्याशियों के चयन से लेकर स्थानीय समीकरण तक विधानसभा क्षेत्र के नेता अपनी भूमिका निभाते हैं। लेकिन जिला परिषद चुनाव का दायरा पूरे जिले में फैला होने के कारण संगठन के स्तर पर रणनीति तैयार करने और अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं को एक साथ साधने की क्षमता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
ऐसे में जिला अध्यक्ष के तौर पर बिशनाराम सियाग के सामने केवल जिला परिषद की सीटें जिताने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें पार्टी के विभिन्न गुटों और नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की भी परीक्षा देनी होगी। चुनाव परिणाम यह भी बताएगा कि संगठन की कमान संभालने के बाद जिले में उनकी राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत हुई है।
गुटबाजी से पार पाना सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती चुनाव मैदान में उतरने से पहले अपने घर को मजबूत करना होगी। जिले में कांग्रेस के भीतर अलग-अलग नेताओं के बीच खींचतान और गुटीय राजनीति किसी से छिपी नहीं है। पिछले कुछ समय में ऐसे कई मौके आए हैं, जब पार्टी के भीतर मतभेद सार्वजनिक तौर पर नजर आए। ऐसे में भाजपा से सीधा मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को पहले आंतरिक मतभेदों को नियंत्रित कर एकजुट चुनावी रणनीति बनानी होगी। टिकट वितरण के दौरान यदि गुटीय समीकरण हावी हुए तो इसका असर जमीनी चुनाव पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि बिशनाराम सियाग के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ भाजपा के चुनावी मुकाबले से निपटना और दूसरी तरफ पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के राजनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना।
भाजपा के सामने कांग्रेस का गढ़ भेदने की चुनौती
दूसरी ओर भाजपा के लिए यह चुनाव बीकानेर जिला परिषद की राजनीति में नया इतिहास बनाने का अवसर होगा। केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के कारण पार्टी नेता ‘ट्रिपल इंजन’ के मुद्दे को ग्रामीण विकास से जोड़कर मतदाताओं के बीच ले जाने की कोशिश कर सकते हैं।
वहीं कांग्रेस के पास भाजपा सरकार के खिलाफ स्थानीय मुद्दों, ग्रामीण समस्याओं और सरकार की कथित विफलताओं को चुनावी मुद्दा बनाने का मौका रहेगा। ऐसे में दोनों दलों के बीच मुकाबला केवल पार्टी संगठन का नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व की साख का भी होगा।
बहुमत के बाद भी आसान नहीं होगी ‘प्रमुख’ की राह
जिला परिषद चुनाव में सबसे दिलचस्प तस्वीर परिणाम के बाद सामने आ सकती है। मान लीजिए कांग्रेस बहुमत हासिल करने में सफल रहती है, तब भी पार्टी के भीतर जिला प्रमुख पद को लेकर सियासी खींचतान शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल जिला प्रमुख का पद केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जिले की राजनीति में प्रभाव और राजनीतिक हैसियत का बड़ा केंद्र माना जाता है। ऐसे में पार्टी के अलग-अलग खेमे अपने पसंदीदा चेहरे को प्रमुख बनाने के लिए सक्रिय हो सकते हैं।
यहीं पर बिशनाराम सियाग की राजनीतिक और संगठनात्मक क्षमता की असली परीक्षा होगी। उन्हें न केवल चुनाव जिताने के लिए रणनीति बनानी होगी, बल्कि चुनाव के बाद निर्वाचित सदस्यों को एकजुट रखने और पार्टी के भीतर संतुलन कायम रखने की चुनौती भी सामने होगी।
17 अगस्त के बाद तेज होगी सियासी बिसात
फिलहाल सभी की निगाहें 17 अगस्त की जिला परिषद वार्ड आरक्षण लॉटरी पर टिकी हैं। वार्डों की तस्वीर साफ होते ही संभावित प्रत्याशियों के नाम सामने आएंगे और इसके साथ ही टिकट को लेकर लॉबिंग भी तेज होने लगेगी।
कौन सा वार्ड किसके लिए अनुकूल है, किस नेता का प्रभाव किस क्षेत्र में है और कौन-सा चेहरा पार्टी को जीत दिलाने की स्थिति में है—इन तमाम सवालों पर मंथन शुरू होगा।
कुल मिलाकर जिला परिषद चुनाव इस बार बीकानेर में सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, संगठन और गुटीय संतुलन की भी परीक्षा बनने जा रहा है। चुनाव परिणाम यह तय करेगा कि कांग्रेस अपने गढ़ को बचाने में कितनी सफल होती है और भाजपा इतिहास बदलने में कितनी कामयाब। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी रहेगा कि बिशनाराम सियाग संगठन की इस अग्निपरीक्षा में कितने सफल होते हैं और चुनाव परिणाम उनके सियासी कद को कितना बढ़ाता है।




























