महेश भादाणी/ बीकानेर। पंचायतराज और निकाय चुनाव में प्रमुख पदों के आरक्षण की लॉटरी के बाद अब बीकानेर नगर निगम की महापौर सीट सामान्य होने से शहर की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। आरक्षण की स्थिति साफ होते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में संभावित दावेदारों को लेकर अंदरखाने में राजनीतिक गणित बैठने लगा है। हालांकि अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, क्योंकि 17 अगस्त को होने वाली पार्षद वार्डों की आरक्षण लॉटरी के बाद ही यह तय होगा कि संभावित दावेदारों के लिए चुनावी मैदान कितना अनुकूल रहता है।
महापौर की सामान्य सीट ने लंबे समय से राजनीतिक सक्रियता बनाए रखने वाले कई नेताओं की उम्मीदों को फिर हवा दे दी है। भाजपा में जहां दावेदारों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है, वहीं कांग्रेस में भी पूर्व महापौर और संगठन से जुड़े कई अनुभवी नेताओं के नाम चर्चा में हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों दलों के भीतर टिकट को लेकर खींचतान और राजनीतिक सक्रियता बढ़ने के आसार हैं।
भाजपा में लंबी हो रही दावेदारों की फेहरिस्त
महापौर सीट सामान्य होते ही भाजपा में संभावित दावेदारों की चर्चा सबसे ज्यादा तेज हुई है। इनमें नगर विकास न्यास के पूर्व अध्यक्ष महावीर रांका, भाजपा जिला उपाध्यक्ष दीपक पारीक, पूर्व महापौर सुशीला कंवर राजपुरोहित, शहर भाजपा अध्यक्ष सुमन छाजेड़, पूर्व महामंत्री मोहन सुराणा, पूर्व अध्यक्ष अखिलेश प्रताप सिंह और पूर्व जिला अध्यक्ष विजय आचार्य जैसे नाम कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में हैं।
इनके अलावा भाजपा के कई मंडल अध्यक्ष, जिला पदाधिकारी और लंबे समय से संगठन में सक्रिय नेता भी महापौर पद की दौड़ में संभावित चेहरे के रूप में सामने आ सकते हैं। हालांकि अभी तक इनमें से किसी ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी दावेदारी नहीं जताई है। पार्टी के स्तर पर भी किसी नाम को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिए गए हैं।
भाजपा के लिए खास बात यह है कि सामान्य सीट होने के बाद पार्टी के पास अनुभवी राजनीतिक चेहरों के साथ-साथ संगठन में सक्रिय नेताओं के भी कई विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में टिकट तय करने में राजनीतिक अनुभव, संगठन में पकड़, वार्ड का समीकरण और पार्टी नेतृत्व के साथ समन्वय जैसे फैक्टर महत्वपूर्ण रह सकते हैं।
कांग्रेस में भी पुराने चेहरों पर नजर
कांग्रेस में भी महापौर की सामान्य सीट होने के बाद संभावित चेहरों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पूर्व महापौर मकसूद अहमद, दिलीप बांठिया, बाबू जयशंकर जोशी, मनीष पुरोहित और अरुण व्यास जैसे नामों की राजनीतिक हलकों में चर्चा है।
इनमें से कुछ नेता पूर्व में विधानसभा चुनाव के लिए भी दावेदारी कर चुके हैं और अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में महापौर चुनाव को लेकर कांग्रेस में भी यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अनुभवी चेहरे पर दांव लगाती है या संगठन में सक्रिय किसी नए चेहरे को मौका देती है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के मुकाबले अपनी रणनीति को मजबूत तरीके से तैयार करने की होगी। महापौर का चुनाव केवल पार्षद का चुनाव नहीं होगा, बल्कि इसमें शहर की स्थानीय राजनीति, गुटीय समीकरण और पार्षदों के बीच समर्थन जुटाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
17 अगस्त के बाद बदल सकता है पूरा गणित
फिलहाल संभावित दावेदारों के नामों को लेकर चर्चाएं जरूर शुरू हो गई हैं, लेकिन इन चर्चाओं पर अंतिम मुहर वार्ड आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद ही लग सकेगी। 17 अगस्त को वार्डों की आरक्षण लॉटरी होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि कौन-सा संभावित दावेदार किस स्थिति में है और उसका वार्ड चुनाव लड़ने के लिहाज से कितना अनुकूल है।
यही वजह है कि महापौर पद की दौड़ में शामिल माने जा रहे कई नेताओं की नजर अब 17 अगस्त पर टिकी है। वार्ड आरक्षण के बाद कुछ नाम मजबूत हो सकते हैं तो कुछ दावेदारों को अपना राजनीतिक ठिकाना बदलने या नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं।
टिकट से पहले शुरू होगी पार्षदों की लामबंदी
महापौर की सामान्य सीट ने भले ही दावेदारों की चर्चा शुरू कर दी हो, लेकिन असली सियासी परीक्षा पार्षदों के चुनाव के बाद होगी। महापौर बनने के लिए केवल चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि निगम में पर्याप्त पार्षदों का समर्थन जुटाना भी अहम होगा।
ऐसे में संभावित दावेदार अभी से अपने राजनीतिक संपर्कों और समर्थक पार्षदों के समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। 17 अगस्त के बाद टिकट की दौड़ के साथ-साथ पार्षदों के बीच व्यक्तिगत समीकरण बनाने की राजनीति भी तेज होने की संभावना है।
कुल मिलाकर महापौर सीट सामान्य होने से बीकानेर नगर निगम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले का एक नया अध्याय खुल गया है। फिलहाल नामों की चर्चा है, लेकिन 17 अगस्त की वार्ड आरक्षण लॉटरी के बाद ही यह तय होगा कि कौन दावेदार मैदान में टिकता है और किसके राजनीतिक समीकरण बदलते हैं। आने वाले दिनों में दावेदारों की सक्रियता के साथ दोनों दलों के भीतर टिकट को लेकर सियासी पारा भी चढ़ने की उम्मीद है।




























