राजलदेसर। भगवती भद्रकाली शक्ति पीठ वैदिक सनातन संस्कृति संरक्षण संस्थान के विस्तृत प्रांगण में वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर वैदिक गुरुकुलम् का भव्य शुभारम्भ अत्यंत श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ किया गया। समारोह के दौरान वातावरण वैदिक मंत्रों के दिव्य उच्चारण से गुंजायमान हो उठा, जिससे पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।
शुभारम्भ के अवसर पर महागणपति पूजन, सप्तमातृका पूजन, वास्तु शांति एवं गृह शांति के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान विधि-विधान से सम्पन्न कराए गए। इस दौरान वैदिक शिक्षा ग्रहण करने हेतु आए बटुकों का परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मंगल प्रवेश कराया गया। सभी पूजन एवं अनुष्ठानों का संचालन आचार्य पं. जीवनकिशोर सामवेदी के सानिध्य और निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में आयोजित विद्वत संगोष्ठी को संबोधित करते हुए दण्डी स्वामी आनंदाश्रमजी महाराज ने कहा कि सनातन मंत्र विज्ञान अत्यंत समृद्ध, प्रभावकारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जहां अनेक यंत्र किसी कार्य को पूरा नहीं कर पाते, वहीं एक शक्तिशाली मंत्र से वह कार्य सहज रूप से सिद्ध हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को समय, संपत्ति और मन का सदुपयोग करते हुए उन्हें भगवद् कार्यों में लगाना चाहिए, जिससे जीवन के साथ-साथ परलोक भी सार्थक बन सके।
भागवताचार्य लक्ष्मणजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह विडम्बना है कि जिस भूमि पर वेदों का उद्भव हुआ, वहीं आज वेद विद्या उपेक्षित होती जा रही है। उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में राजा-महाराजाओं द्वारा वैदिक विद्याओं का संरक्षण किया जाता था, लेकिन वर्तमान समय में यह जिम्मेदारी संत समाज के कंधों पर आ गई है। उन्होंने कहा कि वर्णाश्रम धर्म की स्थापना और उसके प्रथम सोपान को मजबूत करने के लिए गुरुकुलों की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही उन्होंने पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की व्याख्या करते हुए बताया कि गुरुकुल में अध्ययन करने वाला विद्यार्थी इन सभी मूल्यों को गहराई से समझता है।
पंडित बृजलाल शर्मा ने कहा कि बटुक ब्रह्मा की प्रथम संतान के समान होते हैं और गुरुकुल उनके सर्वांगीण विकास का केंद्र होता है। उन्होंने कहा कि गुरुकुल के प्रारम्भिक दिवस पर बटुकों की अच्छी संख्या इस बात का संकेत है कि समाज में वैदिक शिक्षा के प्रति पुनः जागरूकता बढ़ रही है। गुरुकुल विद्यार्थियों को उनके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है और जीवन के सही मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
गुरुकुल की स्थापना से जुड़े सभी कार्य दण्डी स्वामी जोगेन्द्राश्रय श्री महाराज के सानिध्य में सम्पन्न हुए। इस अवसर पर दण्डी स्वामी शिवेन्द्राश्रमजी महाराज ने कहा कि गुरुकुल रूपी इस नवांकुर को विकसित और फलदायी बनाने की जिम्मेदारी समाज और श्रद्धालुओं की है। उन्होंने सभी से इस पवित्र कार्य में सहयोग करने का आह्वान किया।
मंच पर दण्डी स्वामी गजेन्द्राश्रमजी (हिसार), अवधेशाश्रमजी (सूरतगढ़), आचार्य जीवनकिशोर सामवेदी एवं पं. खींवराज शर्मा ज्योतिषाचार्य सहित कई संत-महात्मा विराजमान रहे। कार्यक्रम के दौरान सभी संतों का भावभीना सम्मान किया गया।
समारोह का संचालन डॉ. चेतन स्वामी ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, समाजसेवी एवं धर्मप्रेमी नागरिक उपस्थित रहे, जिन्होंने इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनकर गुरुकुल की स्थापना को सफल और प्रेरणादायक बनाया।



























