सीकर। इतिहास और पुरातत्व के महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित डॉ. गिरीराज पारीक की पुस्तक ‘सामंत, ठिकाने और दुर्ग’ का विमोचन सीकर स्थित त्रिलोक सिंह रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट में आयोजित अकादमिक कार्यक्रम में किया गया। विमोचन समारोह में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़े इतिहास एवं पुरातत्व विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में पुस्तक की विषयवस्तु, ऐतिहासिक स्रोतों और राजस्थान की सामंती व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
पुस्तक में बीकानेर रियासत के इतिहास, सामंती व्यवस्था, ठिकानों, ठिकानेदारों तथा उनसे जुड़े दुर्गों को प्रमुखता से अध्ययन का विषय बनाया गया है। डॉ. गिरीराज पारीक ने पुस्तक के माध्यम से बीकानेर की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े विभिन्न पहलुओं को शोधपरक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें ठिकाना व्यवस्था के ऐतिहासिक स्वरूप के साथ-साथ ठिकानेदारों और उनके दुर्गों से जुड़े ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक पक्षों को भी सामने रखा गया है।
देशभर से जुटे इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ
विमोचन समारोह में प्रोफेसर अजीत कुमार, पूर्व विभागाध्यक्ष, पुरातत्व विभाग, केरल विश्वविद्यालय; प्रोफेसर दानिश मोइन, विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद; प्रोफेसर बी.एल. भादानी, अध्यक्ष, आर्कियोलॉजी एवं एपिग्राफी सोसायटी; डॉ. मदन मीणा, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, पाटन, सीकर; डॉ. पंकज धीरेंद्र, निदेशक, पुरातत्व विभाग, राजस्थान सरकार; प्रोफेसर रविंद्र कुमार, पूर्व कुलपति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय तथा प्रोफेसर मानवेंद्र पुंडीर, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में डॉ. रितेश व्यास, गणेश बेरवाल, डॉ. वृंदा दवे और डॉ. निकिता राठौड़ सहित अन्य शिक्षाविद और शोधार्थी भी मौजूद रहे।
पुस्तक की विषयवस्तु पर हुआ विमर्श
कार्यक्रम के दौरान डॉ. अमित व्यास ने पुस्तक का रिव्यू प्रस्तुत किया। उन्होंने पुस्तक में शामिल ऐतिहासिक संदर्भों, स्रोत सामग्री और विषय के शोधपरक पक्षों पर प्रकाश डाला। इसके बाद उपस्थित विद्वानों ने पुस्तक की विषयवस्तु को लेकर चर्चा की और राजस्थान के इतिहास में सामंत, ठिकाने तथा दुर्गों की भूमिका से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि क्षेत्रीय इतिहास को समझने के लिए स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों, दस्तावेजों, अभिलेखों और स्थापत्य विरासत का अध्ययन महत्वपूर्ण है। राजस्थान में मौजूद अनेक ठिकाने और दुर्ग तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसे विषयों पर शोध और दस्तावेजीकरण से क्षेत्रीय इतिहास को व्यापक अकादमिक संदर्भ में सामने लाने में मदद मिलती है।
ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण पर जोर
समारोह में राजस्थान की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण और उसके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। विद्वानों ने कहा कि इतिहास केवल राजवंशों और युद्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय ठिकानों, दुर्गों, स्थापत्य, अभिलेखों और उनसे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के अध्ययन से भी इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियां सामने आती हैं।
पुस्तक के विमोचन के बाद हुए अकादमिक विमर्श ने कार्यक्रम को शोधपरक और विचार-विमर्श केंद्रित स्वरूप दिया। उपस्थित विद्वानों ने क्षेत्रीय इतिहास पर इस प्रकार के शोध कार्यों को महत्वपूर्ण बताते हुए ऐतिहासिक स्रोतों के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों तक उन्हें पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।



























